श्री शनि वज्रपंजर कवच: ब्रह्मांड पुराण, साढ़े साती और 'वज्र' जैसी सुरक्षा !

वज्रपंजर कवच: पौराणिक उद्गम, पाठ विधि और तांत्रिक विश्लेषण पर एक विस्तृत शोध प्रतिवेदन
1. श्री शनि वज्रपंजर कवचम्: मूल पाठ और विश्लेषण
किसी भी मन्त्र या स्तोत्र के पाठ से पूर्व उसके ऋषि, छंद और देवता का स्मरण अनिवार्य होता है। यह साधक को उस मन्त्र की मूल चेतना से जोड़ता है।
अस्य श्रीशनैश्चर वज्रपञ्जर कवचस्तोत्र मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीशनैश्चरः देवता, श्रीशनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥
कवच पाठ से पूर्व देवता के स्वरूप का ध्यान करना आवश्यक है ताकि मन एकाग्र हो सके।
नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी
गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः
सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः ॥
यह मुख्य भाग है जहाँ साधक अपने शरीर के विभिन्न अंगों की सुरक्षा की प्रार्थना करता है।
ब्रह्मोवाच ।
शृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ॥
कवचं देवतावासं वज्रपञ्जरसञ्ज्ञकम् ।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥
ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः ।
नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ॥
नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करिः सदा ।
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः
स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रदः ।
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पातु असितस्तथा ॥
नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ।
ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा ॥
पादौ मन्दगतिः पातु सर्वाङ्गं पातु पिप्पलः ।
अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि रक्षेन्मे सूर्यनन्दनः ॥
2. कवच का उद्गम, संदर्भ और पौराणिक पृष्ठभूमि
जैसा कि उपरोक्त पाठ की पुष्पिका में स्पष्ट है, इस कवच का मुख्य स्रोत ब्रह्मांड पुराण है। पुराणों के वर्गीकरण में ब्रह्मांड पुराण एक महापुराण है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति, भूगोल, और आध्यात्मिक विद्याओं का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें 'ब्रह्म-नारद संवाद' एक महत्वपूर्ण खंड है जहाँ देवर्षि नारद, लोक-कल्याण की भावना से, ब्रह्मा जी से प्रश्न करते हैं कि कलियुग में जब मनुष्य ग्रहों की पीड़ा से ग्रस्त होंगे, तो उनकी रक्षा कैसे होगी ।
3. अनुष्ठान विधि: श्रद्धा एवं नियमपूर्वक पाठ कैसे करें?
- शुद्धि: साधक को स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। शनि की पूजा के लिए नीले या काले वस्त्र श्रेष्ठ माने जाते हैं। यदि यह संभव न हो, तो श्वेत वस्त्र धारण करें, परन्तु लाल रंग से बचें (क्योंकि लाल मंगल/सूर्य का रंग है जो शनि का शत्रुवत माना जा सकता है)।
- समय: सर्वोत्तम समय शनिवार की संध्या (सूर्यास्त के बाद) या ब्रह्म मुहूर्त है। 'शनि प्रदोष' या 'शनि अमावस्या' इसके अनुष्ठान के लिए विशेष फलदायी तिथियां हैं।
- आसन: कुशा (घास) या ऊनी आसन (काले रंग का कंबल) का प्रयोग करें। इससे ऊर्जा का संचय होता है।
- दिशा: पश्चिम दिशा शनि की दिशा है। अतः पश्चिम की ओर मुख करके पाठ करना सबसे उत्तम है।
दाहिने हाथ में जल, अक्षत (चावल), और यदि संभव हो तो काला तिल और नीला फूल लें। निम्न संकल्प बोलें:
"मम जन्मराशौ गोचरे वा शनि-कृत सर्व-रिष्ट-निवृत्तये, श्रीशनैश्चर-प्रसाद-सिद्ध्यर्थे, वज्रपञ्जर-कवच-स्तोत्र-महामन्त्र-जपं अहं करिष्ये।"
(अर्थ: मेरी जन्म राशि या गोचर में शनि द्वारा कृत समस्त अरिष्टों की निवृत्ति और शनिदेव की कृपा प्राप्ति हेतु, मैं इस वज्रपंजर कवच का जप कर रहा हूँ।)
इसके बाद जल को भूमि पर छोड़ दें।
शोध सामग्री बताती है कि कवच का पूर्ण लाभ 'न्यास' के बिना नहीं मिलता। न्यास का अर्थ है शरीर के अंगों में देवता को स्थापित करना।
करन्यास (हाथों में):
ॐ शं शनैश्चराय अंगुष्ठाभ्यां नमः (अंगूठे को स्पर्श करें)
ॐ विं विश्वरूपाय तर्जनीभ्यां नमः (तर्जनी को स्पर्श करें)
... इसी प्रकार अन्य उंगलियों में शनि के बीजाक्षरों का न्यास करें। (सामान्य साधक केवल "ॐ शं शनैश्चराय नमः" बोलकर सभी उंगलियों का न्यास कर सकते हैं)।
अंगन्यास (शरीर में):
ॐ शं शनैश्चराय हृदयाय नमः (हृदय)
ॐ शं शनैश्चराय शिरसे स्वाहा (सिर)
ॐ शं शनैश्चराय शिखायै वषट् (शिखा/चोटी)
ॐ शं शनैश्चराय कवचाय हुम् (दोनों कंधों को क्रॉस करके स्पर्श करें)
- सर्वप्रथम गणेश जी का स्मरण करें।
- फिर विनियोग और ध्यान (नीलाम्बरो...) का पाठ करें।
- इसके उपरांत मूल कवच (श्लोक 3 से 7) का पाठ करें।
- अंत में फलश्रुति (श्लोक 8-11) पढ़ें।
- आवृत्ति: सामान्यतः 11 बार पाठ करने का विधान है। घोर संकट (जैसे साढ़े साती का चरम) में, इसे प्रतिदिन 108 बार 40 दिनों तक करने का संकल्प लिया जा सकता है।
पाठ के अंत में देवता को मानसिक रूप से प्रणाम करें और किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा मांगें: