1. श्री काली चालीसा: संपूर्ण मूल पाठ
॥ दोहा ॥
जय जय सीता राम के, मध्य वासिनी अम्ब।
देहु दर्श जगदम्ब अब, करहु न मातु विलम्ब॥
जय तारा जय कालिका, जय दश विद्या वृन्द।
काली चालीसा रचत, एक सिद्धि कवि हिन्द॥
प्रात: काल उठ जो पढ़े, दुपहरिया या शाम।
दु:ख दरिद्रता दूर हो, सिद्धि होय सब काम॥
॥ चौपाई ॥
जय काली कंकाल मालिनी। जय मंगला महाकपालिनी॥
रक्तबीज वध कारिणी माता। सदा भक्त जन की सुखदाता॥
शिरो मालिका भूषित अंगे। जय काली जय मद्य मतंगे॥
हर हृदयारविन्द सुविलासिनि। जय जगदम्ब सकल दुःख नाशिनि॥
ह्रीं काली श्रीं महाकराली। क्रीं कल्याणी दक्षिणा काली॥
जय कलावती जय विद्यावती। जय तारा सुन्दरी महामति॥
देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट। होहु भक्त के आगे परगट॥
जय ओंकारे जय हुंकारे। महाशक्ति जय अपरम्पारे॥
कमला कलियुग दर्प विनाशिनि। सदा भक्तजन की भयनाशिनि॥
अब जगदम्ब न देर लगावहु। दुःख दरिद्रता मोर हटावहु॥
जयति कराल कालिका माता। कालानल समान द्युति गाता॥
जय शंकरी सुरेशि सनातनि। कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनि॥
कपर्दिनी कलि कलुष विमोचिनि। जय विकराल नत नलििन विलोचिनि॥
आनन्द करणी आनन्द निधाना। देहु मातु मोहि निर्मल ज्ञाना॥
करुणामृत सागर कृपामयी। होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी॥
सकल जीव तोहिं परम पियारा। सकल विश्व तोरे आधारा॥
प्रलय काल में नर्तन कारिणि। जय जननि सब जग की तारिणि॥
महिसुरदह्यि विदारिणी माता। होहु कुपुत्र पर भी अब माता॥
हरहु सकल संताप हमारे। होहु अबै अभय हम तुम्हारे॥
निशिदिन रटत नाम तव बानी। होहु सकल विश्व की रानी॥
काली चालीसा जो यह गावै। सो बैकुण्ठ परम पद पावै॥
त्रास मिटै अरु संकट जाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
मातु विहीन अनाथ जो होई। तापर कृपा करहु तुम सोई॥
नाहिं और कोउ वार न पारा। तुम्ही हो जग की पालनहारा॥
क्षमा करहु अपराध हमारे। निशिदिन रटत नाम हम तुम्हारे॥
दासन दास सदा हम होई। माँग जो कछु पावत सोई॥
जाको है यह पाठ सुहावन। सो जन होत है मन भावन॥
रक्तबीज को जैसे मारा। वैसे ही करहु शत्रु संहारा॥
महिषासुर को वध तुम कीन्हा। दानव दल को बेहाल ही कीन्हा॥
चण्ड मुण्ड को तुम संहारा। रण में मचा हाहाकारा॥
धूम्र विलोचन को तुम मारा। सकल जगत को तुम निस्तारा॥
शुम्भ निशुम्भ को वध तुम कीन्हा। सब देवन को अभय वर दीन्हा॥
यही अरज है मातु हमारी। हरहु कष्ट सब जो है भारी॥
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं एकचित तुम्हें भवानी॥
प्रेम सहित जो करे चालीसा। तापर कृपा करहिं गौरीशा॥
॥ दोहा ॥
जय तारा जय दक्षिणा, कलावती सुख मूल।
शरणागत भक्त है, रहहु सदा अनुकूल॥
तुम्हरो नाम प्रभाव ते, मिटहिं सकल अघ शूल।
करहु कृपा जगदम्बिनी, हरहु सकल भ्रम भूल॥
2. साधना पद्धति: श्रद्धा, विधि और नियम
माँ काली की उपासना के विषय में जनमानस में कई भ्रांतियां व्याप्त हैं, जैसे कि उनकी पूजा केवल श्मशान में या तांत्रिकों द्वारा ही की जा सकती है। परन्तु, काली चालीसा एक सात्विक और गृहस्थ-सुलभ उपासना पद्धति है। शोध में प्राप्त जानकारी के अनुसार, इसकी साधना विधि को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है: बाह्य विधि (कर्मकांड), मानसिक विधि (भावना), और तांत्रिक विधि (प्रयोग)।
2.1 पूजा का उपयुक्त समय और मुहूर्त
- वार: मंगलवार और शनिवार को काली की उग्र शक्ति अधिक सक्रिय मानी जाती है।
- तिथियां: अमावस्या: विशेषकर कार्तिक अमावस्या (दीपावली) की रात्रि को 'महानिशा' कहा जाता है।
- नवरात्रि: चैत्र और शारदीय नवरात्रि की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियां सिद्धिदायक हैं।
- समय: तंत्र शास्त्र के अनुसार सूर्यास्त के बाद (प्रदोष काल) या
मध्यरात्रि (निशीथ काल) का समय काली साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता है।
2.2 विस्तृत पाठ विधि
भक्त को पाठ आरंभ करने से पूर्व शारीरिक और मानसिक शुद्धि सुनिश्चित करनी चाहिए।
नीचे दी गई विधि शास्त्रों और प्रचलित परंपराओं का समन्वय है:
चरण 1: पूर्व तैयारी
पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। लाल वस्त्र धारण करना और लाल ऊनी
आसन या कंबल का प्रयोग ऊर्जा संचयन में सहायक होता है। माँ काली का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
चरण 2: न्यास और विनियोग
"मैं (अपना नाम/गोत्र), अपने (रोग/शत्रु/संकट) निवारण और भगवती काली की कृपा प्राप्ति हेतु श्री काली चालीसा पाठ का संकल्प लेता हूँ।"
चरण 3: पंचोपचार पूजन
रक्त चंदन या सिंदूर का तिलक लगाएं। लाल गुड़हल का फूल अर्पित करें। सरसों या
तिल के तेल का दीपक जलाएं और गुग्गुल की धूप का प्रयोग करें। लौंग, बताशा या पेड़ा का भोग लगाएं।
चरण 4: मंत्र जप
बीज मंत्र: "ॐ क्रीं कालिकायै नमः"
गायत्री मंत्र: "ॐ महाकाल्यै च विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि। तन्नो काली प्रचोदयात्।"
चरण 5: चालीसा का पाठ
पूर्ण लय और भक्ति के साथ पाठ करें। सामान्य रूप से 1 पाठ पर्याप्त है,
परंतु विशेष कामना सिद्धि के लिए 40 दिनों तक प्रतिदिन 7 या 11 पाठ करने का विधान है।