दक्षिण काली कवच: रुद्रयामल तंत्र, अकाल मृत्यु और शत्रु नाश !

कालिका महातन्त्रम्: श्री दक्षिणकालिका कवच
1. मूल संस्कृत पाठ: श्री दक्षिणकालिका कवचम् (रुद्रयामल तन्त्रोक्तम्)
2. कवच का उद्गम, संदर्भ और परंपरा
उपर्युक्त संस्कृत पाठ रुद्रयामल तन्त्र से लिया गया है। यह तन्त्र शाक्त परंपरा, विशेषकर 'कौल मार्ग' के सबसे प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसके अतिरिक्त, काली कवच के अन्य संस्करण भी उपलब्ध हैं, जिनका उल्लेख संदर्भ के लिए आवश्यक है, विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण का संस्करण।
3. पाठ विधि: श्रद्धा एवं नियम
उपयोगकर्ता ने विशेष रूप से पूछा है कि इस कवच का पाठ "किस प्रकार श्रद्धा एवं नियमपूर्वक" किया जाता है। शास्त्रों और परंपराओं के आधार पर विस्तृत विधि निम्नवत है:
2.1 अधिकारी और दीक्षानियम: फलश्रुति (श्लोक 27) में स्पष्ट चेतावनी है: "इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत् कालीदक्षिणाम्... तस्य विद्या न सिध्यति।" अर्थात, बिना कवच के काली मन्त्र का जाप निष्फल है, और परंपरा के अनुसार, गुरु मुख से प्राप्त किए बिना कवच का पूर्ण फल नहीं मिलता।
गृहस्थों के लिए: यदि विधिवत दीक्षा संभव न हो, तो भगवान शिव को ही गुरु मानकर मानसिक आज्ञा लेकर पाठ किया जा सकता है, परन्तु इसमें 'सकाम' भाव की जगह 'निष्काम' (भक्ति) भाव रखना सुरक्षित है।
लाल वस्त्र धारण करना शुभ है। देवी को जपाकुसुम (Red Hibiscus) अत्यंत प्रिय है। नैवेद्य में लौंग, बताशा, या अनार का भोग लगाया जा सकता है।
2.4 पाठ की चरणबद्ध प्रक्रियागंभीर संकट होने पर कवच का 108 बार या 1000 बार पाठ किया जाता है। यह प्रक्रिया किसी योग्य मार्गदर्शक की देखरेख में ही करनी चाहिए।
॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥