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दक्षिण काली कवच: रुद्रयामल तंत्र, अकाल मृत्यु और शत्रु नाश !

दक्षिण काली कवच: रुद्रयामल तंत्र, अकाल मृत्यु और शत्रु नाश !
श्री दक्षिणकालिका कवच: संपूर्ण संस्कृत पाठ, रुद्रयामल तन्त्रोक्त विधि एवं फलश्रुति | Shri Dakshina Kalika Kavach

कालिका महातन्त्रम्: श्री दक्षिणकालिका कवच

1. मूल संस्कृत पाठ: श्री दक्षिणकालिका कवचम् (रुद्रयामल तन्त्रोक्तम्)

विनियोगः ॐ अस्य श्रीकालिकाकवचस्य भैरव ऋषिः, उष्णिक् छन्दः, श्रीदक्षिणकालिका देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्रीं कीलकं, ममाभीष्टसिद्धर्थे सर्वाभीष्टसाधने पाठे विनियोगः। ऋष्यादिन्यासः ॐ भैरवऋषये नमः शिरसि। उष्णिक्छन्दसे नमः मुखे। श्रीदक्षिणकालिकादेवतायै नमः हृदि। ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये। हूं शक्तये नमः पादयोः। क्रीं कीलकाय नमः नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। ध्यानम् ध्यायेत् कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम्। चतुर्भुजां ललज्जिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम्॥ नीलोत्पलदलश्यामां शत्रुसङ्घविदारिणीम्। नरमुण्डं तथा खड्गं कमलं च वरं तथा॥ निर्भयां रक्तवदनां दंष्ट्रालीघोररूपिणीम्। साट्टहासाननां देवी सर्वदा च दिगम्बरीम्॥ शवासनस्थितां कालीं मुण्डमालाविभूषिताम्। इति ध्यात्वा महाकालीं ततस्तु कवचं पठेत्॥ अथ कवचम् भैरव उवाच कालिका घोररूपा सर्वकामप्रदा शुभा। सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे॥ ह्रीं ह्रीं स्वरूपिणी चैव ह्रीं ह्रीं ह्रीं रूपिणी तथा। ह्रीं ह्रीं क्षों क्षौं स्वरूपा सा सदा शत्रून् विदारयेत्॥ श्रीं ह्रीं ऐं रूपिणी देवी भवबन्धविमोचिनी। हुं रूपिणी महाकाली रक्षास्मान् देवि सर्वदा॥ यया शुम्भो हतो दैत्यो निशुम्भश्च महासुरः। वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शङ्करप्रियाम्॥ ब्रह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका। कौमार्यैन्द्री च चामुण्डा खादन्तु मम विद्विषः॥ सुरेश्वरी घोररूपा चण्डमुण्डविनाशिनी। मुण्डमालावृताङ्गी च सर्वतः पातु मां सदा॥ ह्रीं ह्रीं कालिके घोरदंष्ट्रे रुधिरप्रिये। रुधिरपूर्णवक्त्रे च रुधिरावृतस्तनि॥ मम शत्रून् खादय खादय हिंसय हिंसय मारय मारय। भिन्धि भिन्धि छिन्धि छिन्धि उच्चाटय उच्चाटय॥ द्रावय द्रावय शोषय शोषय स्वाहा। ह्रीं ह्रीं कालिकायै मम शत्रून् समर्पयामि स्वाहा॥ ॐ जय जय किरि किरि किटि किटि कट कट मर्दय मर्दय। मोहयय मोहय पद्मवासिन्यै कालिकायै नमः॥ शिरो मे कालिका पातु क्रींकारैकाक्षरी परा। क्रीं क्रीं क्रीं मे ललाटं च कालिका खड्गधारिणी॥ हूं हूं पातु नेत्रयुग्मं ह्रीं ह्रीं पातु श्रुती मम। दक्षिणकालिका पातु घ्राणयुग्मं महेश्वरी॥ क्रीं क्रीं क्रीं रसनां पातु हूं हूं पातु कपोलकम्। वदनं सकलं पातु ह्रीं ह्रीं स्वाहास्वरूपिणी॥ द्वाविंशत्यक्षरी स्कन्धौ महाविद्या सुखप्रदा। खड्गमुण्डधरा काली सर्वाङ्गं अभितोऽवतु॥ क्रीं हूं ह्रीं त्र्यक्षरी पातु चामुण्डा हृदयं मम। ऐं हूं ॐ ऐं स्तनद्वन्द्वं महात्रिपुरसुन्दरी॥ अष्टाक्षरी महाविद्या भुजौ पातु सकर्तृका। क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं षडक्षरी करौ मम॥ क्रीं नाभिं मध्यदेशं च दक्षिणा कालिकावतु। क्रीं स्वाहा पातु पृष्ठं च कालिका सा दशाक्षरी॥ ह्रीं क्रीं दक्षिणकालिके हूं ह्रीं पातु कटिद्वयम्। काली दशाक्षरी विद्या स्वाहा पातु ध्वजद्वयम्॥ ह्रीं क्रीं दक्षिणकालिके हूं ह्रीं स्वाहा परमेश्वरी। शुक्रं गुह्यं सदा पातु चतुर्दशाक्षरी मम॥ ह्रीं क्रीं दक्षिणकालिके हूं ह्रीं स्वाहा स्वरूपिणी। ऊरुद्वयं सदा पातु विद्या पञ्चदशाक्षरी॥ क्रीं ह्रीं ह्रीं पातु गुल्फं च दक्षिणकालिकाऽवतु। क्रीं हूं ह्रीं स्वाहा पदं पातु चतुर्दशाक्षरी मम॥ खड्गमुण्डधरा काली वरदाभयधारिणी। विद्याभिः सकलाभिः सा सर्वाङ्गमभितोऽवतु॥ फलश्रुतिः इति ते कथितं दिव्यं कवचं परमाद्भुतम्। यः पठेत् प्रातरुत्थाय शुचिः प्रयतमानसः॥ स भवेत् सर्वसिद्धीशः सर्वत्र विजयी भवेत्। यस्याः प्रसादादीशोऽहं त्रैलोक्यविजयी प्रभुः॥ धनाधिपः कुबेरोऽपि सुरेशोऽभूच्छचीपतिः। एवं हि सकला देवाः सर्वसिद्धीश्वराः प्रिये॥ न देयं परशिष्येभ्यो ह्यभक्तेभ्यो विशेषतः। शिष्येभ्यो भक्तियुक्तेभ्यो ह्यन्यथा मृत्युमाप्नुयात्॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत् कालीदक्षिणाम्। शतलक्षं प्रजप्तोऽपि तस्य विद्या न सिध्यति॥ ॥ इति श्री रुद्रयामले भैरवभैरवीसंवादे दक्षिणकालिकाकवचं सम्पूर्णम् ॥

2. कवच का उद्गम, संदर्भ और परंपरा

उपर्युक्त संस्कृत पाठ रुद्रयामल तन्त्र से लिया गया है। यह तन्त्र शाक्त परंपरा, विशेषकर 'कौल मार्ग' के सबसे प्रामाणिक और प्राचीन ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसके अतिरिक्त, काली कवच के अन्य संस्करण भी उपलब्ध हैं, जिनका उल्लेख संदर्भ के लिए आवश्यक है, विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण का संस्करण।

3. पाठ विधि: श्रद्धा एवं नियम

उपयोगकर्ता ने विशेष रूप से पूछा है कि इस कवच का पाठ "किस प्रकार श्रद्धा एवं नियमपूर्वक" किया जाता है। शास्त्रों और परंपराओं के आधार पर विस्तृत विधि निम्नवत है:

2.1 अधिकारी और दीक्षा

नियम: फलश्रुति (श्लोक 27) में स्पष्ट चेतावनी है: "इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत् कालीदक्षिणाम्... तस्य विद्या न सिध्यति।" अर्थात, बिना कवच के काली मन्त्र का जाप निष्फल है, और परंपरा के अनुसार, गुरु मुख से प्राप्त किए बिना कवच का पूर्ण फल नहीं मिलता।

गृहस्थों के लिए: यदि विधिवत दीक्षा संभव न हो, तो भगवान शिव को ही गुरु मानकर मानसिक आज्ञा लेकर पाठ किया जा सकता है, परन्तु इसमें 'सकाम' भाव की जगह 'निष्काम' (भक्ति) भाव रखना सुरक्षित है।

2.2 समय और स्थान
समय: काली उपासना के लिए मध्यरात्रि (11:30 PM to 12:30 AM) सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
दिशा: उत्तर (मोक्ष/सिद्धि) या पूर्व (विद्या) की ओर मुख करें। सामान्य साधक को दक्षिण मुख नहीं करना चाहिए।
आसन: लाल रंग का ऊनी आसन या कुशा का आसन सर्वश्रेष्ठ है।
2.3 पूजन सामग्री

लाल वस्त्र धारण करना शुभ है। देवी को जपाकुसुम (Red Hibiscus) अत्यंत प्रिय है। नैवेद्य में लौंग, बताशा, या अनार का भोग लगाया जा सकता है।

2.4 पाठ की चरणबद्ध प्रक्रिया
शुद्धिकरण: स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें और आचमन करें।
गणेश एवं गुरु वंदना: किसी भी साधना से पूर्व गणेश जी और अपने गुरु का स्मरण करें।
संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें: "मैं (अमुक गोत्र/नाम) अपने शत्रुओं के नाश, सर्व-रक्षा और माता काली की कृपा प्राप्ति हेतु इस कवच का पाठ कर रहा हूँ।"
विनियोग एवं न्यास: विनियोग मन्त्र पढ़कर जल छोड़ें और न्यास करें।
मूल पाठ: कवच के 22 श्लोकों का पाठ स्पष्ट उच्चारण के साथ करें।
समर्पण: पाठ के अंत में जल देवी के चरणों में अर्पित करें: "अनेन पाठेन श्री दक्षिणकालिका प्रीयताम् न मम।"
2.5 विशेष अनुष्ठान

गंभीर संकट होने पर कवच का 108 बार या 1000 बार पाठ किया जाता है। यह प्रक्रिया किसी योग्य मार्गदर्शक की देखरेख में ही करनी चाहिए।

॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥

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