श्री आद्या स्तोत्र: ब्रह्मयामल तंत्र, रोग मुक्ति और सिद्धि रहस्य !

श्री आद्या स्तोत्रम्: शाक्त आगम और भक्ति परंपरा का महासमन्वय
भाग 1: श्री आद्या स्तोत्रम् (मूल पाठ)
साधना के नियमों और पाठकों की सुविधा के लिए, यहाँ ब्रह्मयामल तंत्र के अंतर्गत ब्रह्म-नारद संवाद में वर्णित "श्री आद्या स्तोत्र" का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है।
(कवच - रक्षात्मक मंत्र) जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः । नारायणी शीर्षदेशे सर्वाङ्गे सिंहवाहिनी ॥ शिवदूती उग्रचण्डा प्रत्यङ्गे परमेश्वरी । विशालाक्षी महामाया कौमारी शङ्खिनी शिवा चक्रिणी जयदात्री च रणमत्ता रणप्रिया । दुर्गा जयन्ती काली च भद्रकाली महोदरी ॥ नारसिंही च वाराही सिद्धिदात्री सुखप्रदा । भयङ्करी महारौद्री महाभयविनाशिनी ॥ ॥ इति ब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे आद्यास्तोत्रं समाप्तम् ॥
भाग 2: शास्त्रीय उद्गम और तांत्रिक संदर्भ
इस स्तोत्र की जड़ें, इसका ऐतिहासिक महत्व और जिस ग्रंथ से यह उद्भूत हुआ है, उसका विश्लेषण किसी भी साधक के लिए अत्यंत आवश्यक है। 'आद्या' शब्द ही अपने आप में एक संपूर्ण दर्शन है, जो सृष्टि के आदि कारण की ओर इंगित करता है।
2.1 स्रोत ग्रंथ: ब्रह्मयामल तंत्र
आद्या स्तोत्र की पुष्पिका स्पष्ट रूप से कहती है: "इति ब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे..." अर्थात यह स्तोत्र ब्रह्मयामल तंत्र के अंतर्गत आता है।
'यामल' साहित्य का महत्व: भारतीय आगम परंपरा में 'तंत्र' और 'यामल' दो विशिष्ट श्रेणियां हैं। जहां तंत्र अक्सर शिव और शक्ति के बीच के संवाद (आगम और निगम) के रूप में होते हैं, वहीं 'यामल' साहित्य (शाब्दिक अर्थ: युगल या जोड़ा) भैरव और भैरवी के अद्वैत संवाद और सृष्टि की सामरस्य अवस्था पर केंद्रित होता है।
भाग 3: साधना पद्धति और अनुष्ठानिक विधि
उपयोगकर्ता की विशिष्ट मांग "श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पाठ विधि" को ध्यान में रखते हुए, यहाँ शास्त्रों और परंपरा के आधार पर विस्तृत विधि दी जा रही है।
3.1 पूर्व तैयारी
समय :
- नित्य पाठ के लिए: प्रातः काल या संध्या वंदन के समय।
- विशेष कामना (सिद्धि) के लिए: अमावस्या की मध्यरात्रि (महानिशा), अष्टमी, चतुर्दशी, या मंगलवार/शनिवार की रात्रि।
दिशा:
- पूर्व : ज्ञान और भक्ति के लिए।
- उत्तर : शक्ति, मोक्ष और लौकिक विजय के लिए।
आसन : लाल रंग का ऊनी कम्बल या कुश का आसन। नंगे फर्श पर बैठकर पाठ न करें, इससे ऊर्जा का क्षय होता है।
वस्त्र: लाल या श्वेत स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
3.2 संकल्प और विनियोग
पाठ शुरू करने से पहले दाहिने हाथ में जल, अक्षत (चावल) और एक लाल फूल लेकर संकल्प करें:
(जल भूमि पर छोड़ दें।)
इसके बाद विनियोग (श्लोक से पहले दिया गया भाग) पढ़ें और जल स्पर्श करें।
3.3 न्यास - शरीर का पवित्रीकरण
चूँकि यह स्तोत्र एक 'कवच' भी है, अतः अंगों में देवी की स्थापना करें:
- ॐ आद्यायै नमः (हृदय में)
- ॐ कालिकायै नमः (शिर में)
- ॐ ह्रीं बीजे नमः (शिखा में)
- ॐ माया शक्तये नमः (कवच/कंधों पर)
3.4 ध्यान
पाठ से पूर्व देवी के स्वरूप का मानसिक ध्यान करें। आद्या स्तोत्र के लिए सात्विक ध्यान (श्याम वर्ण, प्रसन्न मुख, वर और अभय मुद्रा) उपयुक्त है, अथवा महाकाली का पारंपरिक ध्यान:
(अर्थ: जो शव पर आरूढ़ हैं, भयानक होते हुए भी वर देने वाली हैं, हँसमुख हैं और हाथ में कपाल व खड्ग लिए हुए हैं।)
3.5 पाठ के नियम
उच्चारण: पाठ मध्यम स्वर में करें। न बहुत जोर से चिल्लाएं, न ही मन में बुदबुदाएं (जब तक कि मानसिक जाप न कर रहे हों)। प्रत्येक अक्षर स्पष्ट होना चाहिए।
आवृत्ति :
- सामान्य फल के लिए: नित्य 1 पाठ।
- संकट निवारण के लिए: 108 पाठ (एक बैठक में या संकल्प लेकर 40 दिनों में)।
- पुत्र/संतान प्राप्ति के लिए: श्लोक में वर्णित "त्रिपक्षं" (45 दिन) या "षण्मासं" (6 महीने) तक नित्य पाठ अनिवार्य है।
नैवेद्य: पाठ के बाद देवी को गुड़, बताशा या लाल फूल (जपाकुसुमा/गुड़हल) अर्पित करें।