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श्री आद्या स्तोत्र: ब्रह्मयामल तंत्र, रोग मुक्ति और सिद्धि रहस्य !

श्री आद्या स्तोत्र: ब्रह्मयामल तंत्र, रोग मुक्ति और सिद्धि रहस्य !
श्री आद्या स्तोत्रम्: मूल पाठ, तांत्रिक रहस्य एवं अनुष्ठान विधि | Shri Aadya Stotram Complete Guide

श्री आद्या स्तोत्रम्: शाक्त आगम और भक्ति परंपरा का महासमन्वय

भाग 1: श्री आद्या स्तोत्रम् (मूल पाठ)

साधना के नियमों और पाठकों की सुविधा के लिए, यहाँ ब्रह्मयामल तंत्र के अंतर्गत ब्रह्म-नारद संवाद में वर्णित "श्री आद्या स्तोत्र" का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है।

॥ ॐ नमः आद्यायै ॥ शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि आद्या स्तोत्रं महाफलम् । यः पठेत् सततं भक्त्या स एव विष्णुवल्लभः ॥ मृत्युर्व्याधिभयं तस्य नास्ति किञ्चित् कलौ युगे । अपुत्रा लभते पुत्रं त्रिपक्षं श्रवणं यदि ॥ द्वौ मासौ बन्धनान्मुक्ति विप्रवक्त्रात् श्रुतं यदि । मृतवत्सा जीववत्सा षण्मासं श्रवणं यदि नौकायां सङ्कटे युद्धे पठनाज्जयमाप्नुयात् । लिखित्वा स्थापयेद्गेहे नाग्निचौरभयं क्वचित् ॥ राजस्थाने जयी नित्यं प्रसन्नाः सर्वदेवताः । ॐ ह्रीं ब्रह्माणी ब्रह्मलोके च वैकुण्ठे सर्वमङ्गला ॥ इन्द्राणी अमरावत्यामम्बिका वरुणालये । यमालये कालरूपा कुबेरभवने शुभा ॥ महानन्दाग्निकोणे च वायव्यां मृगवाहिनी । नैऋत्यां रक्तदन्ता च ऐशान्यां शूलधारिणी ॥ पाताले वैष्णवीरूपा सिंहले देवमोहिनी । सुरसा च मणिद्वीपे लङ्कायां भद्रकालिका ॥ रामेश्वरी सेतुबन्धे विमला पुरुषोत्तमे । विरजा औड्रदेशे च कामाख्या नीलपर्वते ॥ कालिका वङ्गदेशे च अयोध्यायां महेश्वरी । वाराणस्यामन्नपूर्णा गयाक्षेत्रे गयेश्वरी कुरुक्षेत्रे भद्रकाली व्रजे कात्यायनी परा । द्वारकायां महामाया मथुरायां माहेश्वरी ॥ क्षुधा त्वं सर्वभूतानां वेला त्वं सागरस्य च । नवमी शुक्लपक्षस्य कृष्णस्यैकादशी परा ॥ दक्षस्य दुहिता देवी दक्षयज्ञविनाशिनी । रामस्य जानकी त्वं हि रावणध्वंसकारिणी ॥ चण्डमुण्डवधे देवी रक्तबीजविनाशिनी । निशुम्भशुम्भमथिनी मधुकैटभघातिनी ॥ विष्णुभक्तिप्रदा दुर्गा सुखदा मोक्षदा सदा । आद्यास्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सततं नरः ॥ सर्वज्वरभयं न स्यात् सर्वव्याधिविनाशनम् । कोटितीर्थफलं तस्य लभते नात्र संशयः ॥
(कवच - रक्षात्मक मंत्र) जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः । नारायणी शीर्षदेशे सर्वाङ्गे सिंहवाहिनी ॥ शिवदूती उग्रचण्डा प्रत्यङ्गे परमेश्वरी । विशालाक्षी महामाया कौमारी शङ्खिनी शिवा चक्रिणी जयदात्री च रणमत्ता रणप्रिया । दुर्गा जयन्ती काली च भद्रकाली महोदरी ॥ नारसिंही च वाराही सिद्धिदात्री सुखप्रदा । भयङ्करी महारौद्री महाभयविनाशिनी ॥ ॥ इति ब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे आद्यास्तोत्रं समाप्तम् ॥

भाग 2: शास्त्रीय उद्गम और तांत्रिक संदर्भ

इस स्तोत्र की जड़ें, इसका ऐतिहासिक महत्व और जिस ग्रंथ से यह उद्भूत हुआ है, उसका विश्लेषण किसी भी साधक के लिए अत्यंत आवश्यक है। 'आद्या' शब्द ही अपने आप में एक संपूर्ण दर्शन है, जो सृष्टि के आदि कारण की ओर इंगित करता है।

2.1 स्रोत ग्रंथ: ब्रह्मयामल तंत्र

आद्या स्तोत्र की पुष्पिका स्पष्ट रूप से कहती है: "इति ब्रह्मयामले ब्रह्मनारदसंवादे..." अर्थात यह स्तोत्र ब्रह्मयामल तंत्र के अंतर्गत आता है।

'यामल' साहित्य का महत्व: भारतीय आगम परंपरा में 'तंत्र' और 'यामल' दो विशिष्ट श्रेणियां हैं। जहां तंत्र अक्सर शिव और शक्ति के बीच के संवाद (आगम और निगम) के रूप में होते हैं, वहीं 'यामल' साहित्य (शाब्दिक अर्थ: युगल या जोड़ा) भैरव और भैरवी के अद्वैत संवाद और सृष्टि की सामरस्य अवस्था पर केंद्रित होता है।

भाग 3: साधना पद्धति और अनुष्ठानिक विधि

उपयोगकर्ता की विशिष्ट मांग "श्रद्धा एवं भक्ति के साथ पाठ विधि" को ध्यान में रखते हुए, यहाँ शास्त्रों और परंपरा के आधार पर विस्तृत विधि दी जा रही है।

3.1 पूर्व तैयारी

समय :

  • नित्य पाठ के लिए: प्रातः काल या संध्या वंदन के समय।
  • विशेष कामना (सिद्धि) के लिए: अमावस्या की मध्यरात्रि (महानिशा), अष्टमी, चतुर्दशी, या मंगलवार/शनिवार की रात्रि।

दिशा:

  • पूर्व : ज्ञान और भक्ति के लिए।
  • उत्तर : शक्ति, मोक्ष और लौकिक विजय के लिए।

आसन : लाल रंग का ऊनी कम्बल या कुश का आसन। नंगे फर्श पर बैठकर पाठ न करें, इससे ऊर्जा का क्षय होता है।

वस्त्र: लाल या श्वेत स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

3.2 संकल्प और विनियोग

पाठ शुरू करने से पहले दाहिने हाथ में जल, अक्षत (चावल) और एक लाल फूल लेकर संकल्प करें:

"ॐ अद्य... (अपना गोत्र और नाम)... अहं सर्वारिष्ट निवृत्त्यर्थं, सर्वव्याधि विनाशार्थं, धन-धान्य-पुत्र प्राप्त्यर्थं च श्री आद्या कालिका प्रीतिकामनया आद्यास्तोत्रस्य पाठं करिष्ये।"

(जल भूमि पर छोड़ दें।)

इसके बाद विनियोग (श्लोक से पहले दिया गया भाग) पढ़ें और जल स्पर्श करें।

3.3 न्यास - शरीर का पवित्रीकरण

चूँकि यह स्तोत्र एक 'कवच' भी है, अतः अंगों में देवी की स्थापना करें:

  • ॐ आद्यायै नमः (हृदय में)
  • ॐ कालिकायै नमः (शिर में)
  • ॐ ह्रीं बीजे नमः (शिखा में)
  • ॐ माया शक्तये नमः (कवच/कंधों पर)

3.4 ध्यान

पाठ से पूर्व देवी के स्वरूप का मानसिक ध्यान करें। आद्या स्तोत्र के लिए सात्विक ध्यान (श्याम वर्ण, प्रसन्न मुख, वर और अभय मुद्रा) उपयुक्त है, अथवा महाकाली का पारंपरिक ध्यान:

“शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदाम्। हास्ययुक्तां त्रिनेत्रां च कपालकर्त्रिकाकराम्॥”

(अर्थ: जो शव पर आरूढ़ हैं, भयानक होते हुए भी वर देने वाली हैं, हँसमुख हैं और हाथ में कपाल व खड्ग लिए हुए हैं।)

3.5 पाठ के नियम

उच्चारण: पाठ मध्यम स्वर में करें। न बहुत जोर से चिल्लाएं, न ही मन में बुदबुदाएं (जब तक कि मानसिक जाप न कर रहे हों)। प्रत्येक अक्षर स्पष्ट होना चाहिए।

आवृत्ति :

  • सामान्य फल के लिए: नित्य 1 पाठ।
  • संकट निवारण के लिए: 108 पाठ (एक बैठक में या संकल्प लेकर 40 दिनों में)।
  • पुत्र/संतान प्राप्ति के लिए: श्लोक में वर्णित "त्रिपक्षं" (45 दिन) या "षण्मासं" (6 महीने) तक नित्य पाठ अनिवार्य है।

नैवेद्य: पाठ के बाद देवी को गुड़, बताशा या लाल फूल (जपाकुसुमा/गुड़हल) अर्पित करें।

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