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काली आरती: 'मंगल की सेवा', मूल पाठ, अर्थ और मनोकामना !

काली आरती: 'मंगल की सेवा', मूल पाठ, अर्थ और मनोकामना !
माँ काली की आरती "मंगल की सेवा सुन मेरी देवा": संपूर्ण पाठ एवं ऐतिहासिक शोध

माँ काली की आरती "मंगल की सेवा सुन मेरी देवा"

1. माँ काली की आरती: मूल पाठ

आरती: मंगल की सेवा सुन मेरी देवा
(ध्रुपद/स्थायी) मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े। पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट धरे॥ ले ज्वाला तेरी भेंट धरे…
सुन जगदम्बे कर न विलम्बे, संतन के भंडार भरे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥ बुद्धि विधाता तू जग माता, मेरा कारज सिद्ध करे। चरण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन पड़े॥ जब जब भीड़ पड़ी भक्तन पर, तब तब आप सहाय करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
गुरु के वार सकल जग मोह्यो, तरुणी रूप अनूप धरे। माता होकर पुत्र खिलावे, कहीं भार्या भोग करे॥ शुक्र सुखदाई सदा सहाई, संत खड़े जयकार करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिए, भेंट देने तेरे द्वार खड़े। अटल सिंहासन बैठी माता, सिर सोने का छत्र फिरे॥ वार शनिचर कुमकुम बरनी, जब लुंकड़ पर हुकुम करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
खड्ग खप्पर त्रिशूल हाथ लिए, रक्तबीज को भस्म करे। शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे, महिषासुर को पकड़ दले॥ आदित वार आदि भवानी, जन अपने का कष्ट हरे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
कुपित होकर दानव मारे, चण्ड मुण्ड सब चूर करे। जब तुम देखो दया रूप हो, पल में संकट दूर करे॥ सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता, जन की अर्ज कबूल करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
सात बार की महिमा बरनी, सब गुण कौन बखान करे। सिंह पीठ पर चढ़ी भवानी, अटल भवन में राज करे॥ दर्शन पावे मंगल गावे, सिद्ध साधक तेरी भेंट धरे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शिव शंकर हरि ध्यान धरे। इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती, चंवर कुबेर डुलाय रहे॥ जय जननी जय मातु भवानी, अटल भवन में राज करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे॥ (जयकारा: बोल सांचे दरबार की जय!)

2. आरती का उद्गम और ऐतिहासिक संदर्भ

2.1 रचनाकार का विवाद: लोकगीत बनाम आधुनिक कृति

विद्वानों और संगीत इतिहासकारों के बीच इस आरती के रचयिता को लेकर एक रोचक द्वंद्व है, जो यह दर्शाता है कि कैसे लोक साहित्य समय के साथ व्यक्तिगत रचना का रूप ले लेता है।

कवि प्रदीप और सी. अर्जुन का दावा: एक प्रमुख मत यह है कि इस आरती को प्रसिद्ध राष्ट्रवादी और भक्ति गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और इसका संगीत सी. अर्जुन ने तैयार किया था। 1970-80 के दशक में उषा मंगेशकर द्वारा गाया गया संस्करण इस दावे को बल देता है। कवि प्रदीप की लेखन शैली, जो सरल हिंदी और तत्सम शब्दावली का मिश्रण थी (जैसे "तरुणी रूप अनूप धरे"), इस आरती की भाषा-शैली से मेल खाती है।

बलबीर निर्दोष और सुरिंदर कोहली का संस्करण: दूसरी ओर, उत्तर भारत में जागरण सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित नरेंद्र चंचल द्वारा गाए गए संस्करण का श्रेय गीतकार बलबीर निर्दोष और संगीतकार सुरिंदर कोहली को दिया जाता है । नरेंद्र चंचल की गायकी ने इसे शास्त्रीयता के दायरे से निकालकर जन-जन का गीत बना दिया।

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