काली आरती: 'मंगल की सेवा', मूल पाठ, अर्थ और मनोकामना !

माँ काली की आरती "मंगल की सेवा सुन मेरी देवा"
1. माँ काली की आरती: मूल पाठ
(ध्रुपद/स्थायी) मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े। पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट धरे॥ ले ज्वाला तेरी भेंट धरे…
2. आरती का उद्गम और ऐतिहासिक संदर्भ
2.1 रचनाकार का विवाद: लोकगीत बनाम आधुनिक कृति
विद्वानों और संगीत इतिहासकारों के बीच इस आरती के रचयिता को लेकर एक रोचक द्वंद्व है, जो यह दर्शाता है कि कैसे लोक साहित्य समय के साथ व्यक्तिगत रचना का रूप ले लेता है।
कवि प्रदीप और सी. अर्जुन का दावा: एक प्रमुख मत यह है कि इस आरती को प्रसिद्ध राष्ट्रवादी और भक्ति गीतकार कवि प्रदीप ने लिखा था और इसका संगीत सी. अर्जुन ने तैयार किया था। 1970-80 के दशक में उषा मंगेशकर द्वारा गाया गया संस्करण इस दावे को बल देता है। कवि प्रदीप की लेखन शैली, जो सरल हिंदी और तत्सम शब्दावली का मिश्रण थी (जैसे "तरुणी रूप अनूप धरे"), इस आरती की भाषा-शैली से मेल खाती है।
बलबीर निर्दोष और सुरिंदर कोहली का संस्करण: दूसरी ओर, उत्तर भारत में जागरण सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित नरेंद्र चंचल द्वारा गाए गए संस्करण का श्रेय गीतकार बलबीर निर्दोष और संगीतकार सुरिंदर कोहली को दिया जाता है । नरेंद्र चंचल की गायकी ने इसे शास्त्रीयता के दायरे से निकालकर जन-जन का गीत बना दिया।