दशरथ कृत शनि स्तोत्र: साढ़े साती, ढैया और शनि का 'वचन' !

दशरथकृत शनि स्तोत्र: एक विस्तृत विश्लेषणात्मक शोध प्रतिवेदन: ऐतिहासिक, पौराणिक एवं अनुष्ठानिक विवेचन
1. मूल संस्कृत पाठ: दशरथकृत शनि स्तोत्र
यथा निर्देशित, सर्वप्रथम यहाँ राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र का मूल संस्कृत पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है। विद्वान और साधक इसे 'शनि कवच' के रूप में भी श्रद्धापूर्वक धारण करते हैं।
ॐ अस्य श्री शनैश्चर स्तोत्र महामन्त्रस्य दशरथ ऋषिः, शनैश्चरो देवता, त्रिष्टुप् छन्दः, शनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः ॥
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नमः।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते ॥
तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः ॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगाः।
त्वया विलोकिताः सौरे दैन्यमाशु व्रजन्ति च ॥
ब्रह्मा शक्रो यमश्चैव ऋषयः सप्त-तारकाः।
राज्यभ्रष्टाश्च ते सर्वे तव दृष्ट्या विलोकिताः ॥१
देशा नगरग्रामाश्च द्वीपाश्चैवाद्रयस्तथा।
रौद्रदृष्ट्या तु ये दृष्टाः क्षयं गच्छन्ति तत्क्षणात् ॥१
प्रसादं कुरु मे सौरे वरार्थेऽहं तवाश्रितः।
सौरे क्षमस्वापराधं सर्वभूतहिताय च ॥१२॥
(इति श्री दशरथकृतं शनि स्तोत्रं सम्पूर्णम्)
2 पाठ विधि: श्रद्धा एवं नियम
2.1 अधिकारी और पूर्व-तैयारीशुचिता (पवित्रता): शनि अशुद्धि को सहन नहीं करते। पाठ करने से पूर्व स्नान करना अनिवार्य है। गंदे वस्त्र पहनकर या बिना स्नान किए पाठ वर्जित है।
समय (काल):
- दिन: शनिवार (शनैश्चर वार) सर्वश्रेष्ठ है।
- समय: शनि 'पश्चिम' दिशा और 'अंधकार' के स्वामी हैं। अतः सूर्यास्त के बाद (प्रदोष काल) का समय पाठ के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। यदि प्रातःकाल करना हो, तो सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त) करें।
- विशेष तिथियां: शनि अमावस्या, शनि जयंती, या जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में हो।
| सामग्री | विवरण | प्रतीक/महत्व |
|---|---|---|
| आसन | काला या गहरा नीला ऊनी कंबल/कुशा | ऊर्जा का संरक्षण । |
| वस्त्र | काले या नीले वस्त्र (धोती/कुर्ता) | शनि के वर्ण के साथ तादात्म्य। |
| दीपक | तिल के तेल का दीपक | तिल शनि का प्रिय अनाज है। |
| बत्ती | काले रंग की रुई की बत्ती (यदि संभव हो) | शनि की ऊर्जा को आकर्षित करने हेतु। |
| पुष्प | अपराजिता (नीले), शमी पत्र, या कोई नीला फूल | नीला रंग शनि को प्रिय है। |
| प्रसाद | काली उड़द की खिचड़ी, तिल-गुड़, या जामुन | सात्विक भोग। |
| दिशा | पश्चिम | शनि पश्चिम दिशा के दिगपाल हैं। |
आचमन और संकल्प: हाथ में जल लेकर आचमन करें। फिर जल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर संकल्प लें: "मैं (अमुक नाम/गोत्र) अपनी शनि जनित पीड़ा की शांति और सर्व-कल्याण हेतु राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने का संकल्प लेता/लेती हूँ।"
गणेश वंदना: किसी भी पूजा से पहले विघ्नहर्ता गणेश का स्मरण करें: 'ॐ गं गणपतये नमः'।
ध्यान: शनिदेव के स्वरूप का मानसिक ध्यान करें—नील वर्ण, गिद्ध या कौए पर सवार, हाथों में धनुष-बाण और त्रिशूल।
विनियोग और पाठ: पहले विनियोग मंत्र पढ़ें (हाथ में जल लेकर छोड़ें)। फिर श्लोक 1 से 12 तक का स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें।
आवर्तन (Repetition): सामान्य शांति के लिए 1 या 11 बार पाठ करें। साढ़ेसाती के कष्ट निवारण के लिए प्रतिदिन सायंकाल 11 बार पाठ 40 दिनों तक करने का विधान है।
क्षमा प्रार्थना: पाठ के अंत में उच्चारण या विधि में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगें।
2.4 विशेष नियम- दृष्टि: शनि की मूर्ति की आँखों में सीधे न देखें। उनके चरणों की ओर देखकर प्रार्थना करें। (जैसा कि स्तोत्र में वर्णित है 'दुर्नरीक्ष्याय' - जिसे देखना कठिन है)।
- आहार: पाठ वाले दिन (विशेषकर शनिवार को) पूर्ण सात्विक भोजन करें। मांसाहार और मदिरा का सेवन सर्वथा वर्जित है।
- आचरण: शनि कर्मफलदाता हैं। पूजा के साथ-साथ अपने कर्मों को सुधारना आवश्यक है। गरीबों, मजदूरों, दिव्यांगों और वृद्धों का अपमान न करें। उन्हें दान दें। इसे 'छाया दान' (तेल में अपना चेहरा देखकर दान करना) के साथ भी जोड़ा जा सकता है।
3. ज्योतिषीय महत्व एवं फलश्रुति
यह स्तोत्र ज्योतिषीय उपायों में 'रामबाण' माना जाता है। इसकी प्रभावशीलता के कई कारण हैं:
3.1 साढ़ेसाती और ढैया का निवारणशनि की साढ़ेसाती (7.5 वर्ष) और ढैया (2.5 वर्ष) के दौरान जातक को मानसिक तनाव, आर्थिक हानि और शारीरिक कष्ट झेलने पड़ते हैं।
क्रियाविधि : दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से जातक शनि के प्रति 'समर्पण' भाव व्यक्त करता है। स्तोत्र के शब्द शनि की उग्रता को स्वीकार करते हुए उनसे दया की भीख मांगते हैं। यह 'स्वीकारोक्ति' ही शनि के कोप को शांत करती है।