सूर्य देव आरती: 'जय कश्यप-नन्दन', तांबे से अर्घ्य और रविवार व्रत नियम !

भगवान सूर्य देव: आरती, परंपरा, उद्गम एवं उपासना पद्धति पर विस्तृत शोध प्रतिवेदन
1. भगवान सूर्य देव की आरती: मूल पाठ
जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन। त्रिभुवन-तिमिर-निकन्दन, भक्त-हृदय-चन्दन॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी। दु:खहारी, सुखकारी, मानस-मल-हारी॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ सुर-मुनि-भूसुर-वन्दित, विमल विभवशाली। अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ सकल-सुकर्म-प्रसविता, सविता शुभकारी। विश्व-विलोचन मोचन, भव-बन्धन भारी॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ कमल-समूह विकासक, नाशक त्रय तापा। सेवत सहज हरत अति, मनसिज-संतापा॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ नेत्र-व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा-हारी। वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥ जय कश्यप-नन्दन...॥ सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै। हर अज्ञान-मोह सब, तत्त्वज्ञान दीजै॥ जय कश्यप-नन्दन...॥
(संदर्भ के लिए, यह आरती भी बहुधा गाई जाती है, विशेषकर आधुनिक सत्संगों में)
ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान। जगत् के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूपा। धरत सब ही तव ध्यान, ॐ जय सूर्य भगवान।। सारथी अरुण हैं प्रभु तुम, श्वेत कमलधारी। तुम चार भुजाधारी।। अश्व हैं सात तुम्हारे, कोटि किरण पसारे। तुम हो देव महान।। ॐ जय सूर्य भगवान... ।2. आरती का उद्गम और ऐतिहासिक संदर्भ
2.1 वैदिक जड़ेंइस आरती के मूल भाव ऋग्वेद और अथर्ववेद में पाए जाते हैं। ऋग्वेद (1.50, 1.115) में सूर्य के लिए 'विश्वचक्षु' (जगत के नेत्र), 'सप्ते रश्मि' (सात रश्मियां), और 'अघमर्षण' (पाप नाशक) जैसे विशेषणों का प्रयोग हुआ है। "विश्व-विलोचन" शब्द ऋग्वेद के ‘चक्षु मित्रस्य वरुणस्य’ (मित्र और वरुण की आँख) का सीधा अनुवाद है। अतः, यह आरती वैदिक प्रार्थनाओं का ही पद्यमय हिंदी रूपांतरण है।
2.2 रचयिता और आधुनिक मानकीकरणयद्यपि "जय कश्यप-नन्दन" आरती को 'पारंपरिक' माना जाता है , इसकी वर्तमान भाषा शैली (संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिंदी) 17वीं-19वीं शताब्दी के मध्य की प्रतीत होती है, जब संस्कृत स्तोत्रों (जैसे आदित्य हृदय स्तोत्र) को जनभाषा में ढालने का भक्ति आंदोलन चरम पर था।
- गीता प्रेस, गोरखपुर: 20वीं शताब्दी में, गीता प्रेस ने अपनी अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक 'आरती संग्रह' में इस आरती को स्थान दिया। इसके व्यापक वितरण ने इसे उत्तर भारत के हर घर और मंदिर में मानकीकृत कर दिया ।
- संगीत परंपरा: पंडित जसराज, अनूप जलोटा और अनुराधा पौडवाल जैसे ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने इसी आरती को अपनी एल्बमों में गाया है, जिसने इसे "ओम जय जगदीश हरे" की तरह ही एक 'क्लासिक' का दर्जा दिला दिया है।
3. श्रद्धा एवं नियमपूर्वक आरती गायन की विधि
3.1 पूर्व तैयारी- समय : सूर्य उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 96 मिनट पूर्व) से लेकर सूर्योदय के ठीक बाद का एक घंटा होता है। सायं काल में अस्ताचलगामी सूर्य की आरती भी (विशेषकर छठ में) की जाती है।
- शौच और स्नान: नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करें।
- वस्त्र: स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सूर्य पूजा में लाल, केसरिया, या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये रंग सूर्य की ऊर्जा और तेज के प्रतीक हैं। काले या नीले वस्त्रों का त्याग करना चाहिए।
- स्थान और दिशा: किसी खुले स्थान (छत, आंगन, नदी तट) का चयन करें जहाँ से सूर्य स्पष्ट दिखाई दें। साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यदि सूर्य बादलों में छिपे हों, तो भी पूर्व दिशा की ओर मुख करके मानसिक ध्यान करें।
पारंपरिक विधि में, आरती कभी भी सीधे शुरू नहीं की जाती। पहले भगवान सूर्य को जल अर्पित करना (अर्घ्य) अनिवार्य है। यह कृतज्ञता का ज्ञापन है।
पात्र: केवल तांबे के लोटे का प्रयोग करें। तांबा सूर्य की धातु है और इसमें जल ऊर्जित होता है। लोहे या स्टील का प्रयोग वर्जित है।
सामग्री : जल में निम्नलिखित वस्तुएं अवश्य मिलाएं: रोली/कुंकुम, लाल पुष्प (गुड़हल या कनेर), अक्षत, गुड़ और लाल चंदन।
अर्घ्य की विधि:
लोटे को अपने सिर की ऊँचाई से ऊपर उठाएं (दोनों हाथ ऊपर)। धीरे-धीरे जल की धारा छोड़ें।
महत्वपूर्ण: गिरती हुई जलधारा के बीच से सूर्य के बिम्ब को देखें। जलधारा एक लेंस का काम करती है, जो सूर्य की किरणों को सात रंगों में विभक्त कर आँखों तक पहुँचाती है, जिससे नेत्र ज्योति और मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ती है।
मंत्र: जल गिराते समय "ॐ सूर्याय नमः", "ॐ आदित्याय नमः" या "ॐ घृणि सूर्याय नमः" का जाप करें।
3.3 रविवार व्रत और विशेष नियमयदि कोई भक्त विशेष कामना सिद्धि (जैसे रोग मुक्ति, मान-सम्मान, संतान प्राप्ति) के लिए आरती कर रहा है, तो उसे रविवार व्रत के नियमों का भी पालन करना चाहिए:
- नमक का त्याग: रविवार के दिन भोजन में नमक का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।
- एक समय भोजन: सूर्यास्त से पूर्व केवल एक बार मीठा भोजन (गेहूँ की रोटी, गुड़, खीर) ग्रहण करें। सूर्यास्त के बाद भोजन न करें।
- ब्रह्मचर्य: व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- पाठ: आरती के साथ 'आदित्य हृदय स्तोत्र' या 'सूर्य चालीसा' का पाठ सोने पर सुहागा माना जाता है।