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आदित्य हृदय स्तोत्र: रावण वध, शत्रु विजय और आरोग्य का रहस्य !

आदित्य हृदय स्तोत्र: रावण वध, शत्रु विजय और आरोग्य का रहस्य !
आदित्य हृदय स्तोत्र: मूल पाठ, रामायणकालीन उद्गम एवं न्यास विधि | Aditya Hridaya Stotra Complete Guide

आदित्य हृदय स्तोत्र: एक व्यापक अनुशीलन, शास्त्रीय विश्लेषण एवं प्रायोगिक विधि

2. संपूर्ण आदित्य हृदय स्तोत्र

महर्षि वाल्मीकि विरचित रामायण के युद्धकाण्ड के अंतर्गत आने वाला यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण शुद्धता के साथ प्रस्तुत है। यह पाठ गीता प्रेस और निर्णय सागर प्रेस के संस्करणों पर आधारित मानक पाठ है।

विनियोगः
ॐ अस्य आदित्यहृदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्तशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
(मूल स्तोत्र प्रारम्भ)
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपागम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवानृषिः ॥
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥
॥ इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे युद्धकाण्डे अगस्त्यप्रोक्तं आदित्यहृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

2. ऐतिहासिक एवं ग्रंथीय उद्गम

आदित्य हृदय स्तोत्र का उद्गम भारतीय महाकाव्य परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ 'वाल्मीकि रामायण' में निहित है। इस स्तोत्र की स्थिति, रचना और संदर्भ का विश्लेषण इसे केवल एक भक्ति गीत से ऊपर उठाकर एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दस्तावेज के रूप में स्थापित करता है।

2.1 वाल्मीकि रामायण में स्थान

यह स्तोत्र रामायण के युद्धकाण्ड (जिसे दक्षिण भारतीय संस्करणों में लंकाकाण्ड भी कहा जाता है) का एक अभिन्न अंग है। रामायण के विभिन्न संस्करणों में इसके अध्याय (सर्ग) की संख्या में भिन्नता पाई जाती है, जो शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है:

3. श्रद्धा एवं नियमपूर्वक पाठ की विधि

3.1 पाठ का अधिकारी और उपयुक्त समय

अधिकारी: कोई भी व्यक्ति जो शारीरिक व्याधि, मानसिक अवसाद, शत्रु भय, या जीवन में असफलता का सामना कर रहा हो। जाति, वर्ण या लिंग का कोई भेद नहीं है, क्योंकि सूर्य सभी के लिए समान रूप से प्रकाश देते हैं。

समय:

  • सूर्योदय (अरुणोदय): यह सर्वोत्तम समय है। जब सूर्य क्षितिज पर लाल रंग के हों।
  • मध्याह्न: जब सूर्य सिर के ऊपर हों (विशेषकर रविवार को)।
  • संध्याकाल: सूर्यास्त के समय भी पाठ किया जा सकता है, विशेषकर मानसिक शांति के लिए
  • संकट काल: युद्ध या घोर संकट के समय (जैसे राम ने किया) किसी भी समय पाठ मान्य है।

3.2 पूर्व तैयारी

  • स्नान और शुद्धि: साधक को स्नान करके श्वेत या लाल वस्त्र धारण करने चाहिए। यदि पूर्ण स्नान संभव न हो (अस्वस्थता में), तो 'अपवित्रः पवित्रो वा' मंत्र से मानसिक स्नान करें।
  • आचमन: तीन बार जल पीकर आंतरिक शुद्धि करें: ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ हृषीकेशाय नमः।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। यदि सूर्य दिखाई दे रहे हों, तो खड़े होकर पाठ करना अधिक फलदायी है।

3.3 विनियोग

दाहिने हाथ में जल, अक्षत और लाल पुष्प लेकर संकल्प करें। यह अनुष्ठान का उद्देश्य निर्धारित करता है।

मंत्र: "ॐ अस्य आदित्यहृदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषिः अनुष्टुप्छन्दः आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्तशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।" (जल भूमि पर छोड़ दें)।

3.4 न्यास विधि

न्यास का अर्थ है—देवता की शक्तियों को अपने शरीर के अंगों में स्थापित करना। इससे साधक का शरीर 'मंत्रमय' और रक्षा-कवच से युक्त हो जाता है। यह प्रक्रिया तांत्रिक और वैदिक परंपरा का मिश्रण है

करन्यास (हाथों की उंगलियों में):
मंत्रअंगक्रिया
ॐ रश्मिमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमःअंगूठादोनों तर्जनी से अंगूठों को स्पर्श करें।
ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमःतर्जनीदोनों अंगूठों से तर्जनी को स्पर्श करें।
ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमःमध्यमादोनों अंगूठों से मध्यमा को स्पर्श करें।
ॐ विवस्वते अनामिकाभ्यां नमःअनामिकादोनों अंगूठों से अनामिका को स्पर्श करें।
ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमःकनिष्ठिकादोनों अंगूठों से कनिष्ठिका को स्पर्श करें।
ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमःहथेलीदोनों हथेलियों को आपस में स्पर्श करें।
हृदयादि अंगन्यास (शरीर के अंगों में):
मंत्रअंगक्रिया
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमःहृदयदाहिने हाथ से हृदय को स्पर्श करें।
ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहासिरसिर को स्पर्श करें।
ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्शिखाशिखा (चोटी) के स्थान को स्पर्श करें।
ॐ विवस्वते कवचाय हुम्कंधेदोनों हाथों को क्रॉस करके कंधों को छुएं।
ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्नेत्रदाहिने हाथ की उंगलियों से दोनों आंखों और भ्रूमध्य को छुएं।
ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्दिशाएंसिर के ऊपर से हाथ घुमाकर चुटकी बजाएं (दिग्बंध)।

3.5 ध्यान

"जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥"
(अर्थ: गुड़हल के फूल जैसे लाल, कश्यप पुत्र, महातेजस्वी, अंधकार के शत्रु और पाप नाशक सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।)

3.6 पाठ के नियम

  • त्रिगुणित पाठ: अगस्त्य ऋषि ने राम से कहा—"एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा" (इसे तीन बार जपकर)। अतः पूर्ण फल प्राप्ति के लिए स्तोत्र का तीन बार पाठ करना अनिवार्य विधान है。
  • त्राटक: पाठ करते समय सूर्य बिम्ब को खुली आंखों से देखें (यदि सूर्योदय का समय हो)। यदि सूर्य तेज हों, तो अर्ध-उन्मीलित नेत्रों से या हृदय आकाश में सूर्य का ध्यान करते हुए पाठ करें।
  • समर्पण: पाठ के अंत में "ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु" कहकर पुण्य फल ईश्वर को समर्पित करें।

4. फलश्रुति और आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता

अगस्त्य ऋषि द्वारा वर्णित फलश्रुति और आधुनिक साधकों के अनुभव के आधार पर इस स्तोत्र के लाभ बहुआयामी हैं।

4.1 फलश्रुति

स्तोत्र के श्लोक 4, 5 और 25 में इसके लाभ स्पष्ट रूप से बताए गए हैं:

  • सर्वशत्रुविनाशनम्: यह सभी प्रकार के शत्रुओं (बाहरी और आंतरिक जैसे काम, क्रोध, लोभ) का नाश करता है।
  • अक्षय्यं परमं शिवम्: यह कभी क्षय न होने वाला पुण्य और परम कल्याण प्रदान करता है।
  • चिन्ताशोकप्रशमनम्: यह चिंता और शोक की अचूक औषधि है।
  • आयुर्वर्धनमुत्तमम्: यह आयु और जीवन शक्ति को बढ़ाता है.
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